मैं आपको बीस हजार रूपये के बदले नोबेल पुरस्कार लाकर दूंगा- सी. वी. रमन

Raman with Spectrometer

सन 1927 की बात है| सी. वी. रमन का नाम वैश्विक विज्ञान के परिदृश्य में कहीं नहीं था| वैश्विक परिदृश्य क्या देश के परिदृश्य में कही अधिक नहीं था| यहाँ तक कि बंगाल में वैज्ञानिक परिदृश्य में सी. वी. रमन कोई बड़ी हस्ती नहीं थे न ही बहुत जाना पहचाना नाम थे| मगर सी. वी. रमन का वैज्ञानिक सफ़र इतना साधारण भी नहीं था|

सी. वी. रमन पूरी तरह से भारत में ही पले-बढे और पढ़े-लिखे थे| वह ऐसा दौर था जब भारत में पढ़ाने वाले अधिकतम प्रोफेसर भारत के बाहर से पढ़कर आने वाले लोगों में से एक होते थे| सी.वी. रमन ने भारत में पढ़ाई की और प्रेसिडेंसी कोलेज में पढ़ते हुए मात्र 18 साल की उम्र में तत्कालीन सम्मानित जर्नल “फिलोसोफिकल मैगजीन” में अपना पहला शोध पत्र प्रकाशित किया था| ध्यान देने वाली बात यह है कि सी.वी. रमन के पिता चंद्रशेखर भौतिकी के प्रोफ़ेसर थे और माँ संस्कृत के विद्वानों के परिवार से आतीं थीं| हालांकि रमन भौतिकी में आगे भी पढना चाहते थे मगर उनके ख़राब स्वास्थ्य की वजह से वह इंग्लैण्ड पढाई के लिए नहीं जा सके थे| उन दिनों भारत में होने की वज़ह से सीमित विकल्प होने के कारण, सन 1907 में उन्होंने वित्तीय सेवा परीक्षा पास कर ली और एडिशनल एकाउन्टेंट जनरल के पद पर कलकत्ता में नियुक्ति ले ली| इस बीच उनकी शादी भी हो गई|

उन दिनों कलकत्ता की इन्डियन असोसिएशन ऑफ़ कल्टीवेशन ऑफ़ साइंस नामक संस्था की स्थापना हो चुकी थी, जिसे मुख्यतः महेंद्र लाल सरकार ने स्थापित किया था| महेंद्र लाल सरकार एलोपेथी के एक डॉक्टर थे और कलकत्ता की एक दूरदर्शी, महान हस्ती थे| कलकत्ता में नियुक्ति के कुछ समय के बाद अगले 10 साल तक सी.वी. रमन एकाउंट ऑफिस से काम ख़त्म करके इन्डियन असोसिएशन ऑफ़ कल्टीवेशन ऑफ़ साइंस आते रहे और शाम के बाद अपना शोधकार्य करते रहे| सी.वी.रमन को ट्रेन से इन्डियन असोसिएशन ऑफ़ कल्टीवेशन ऑफ़ साइंस आना पड़ता था, ट्रेन इन्डियन असोसिएशन ऑफ़ कल्टीवेशन ऑफ़ साइंस के पास एक स्टेशन पर कुछ धीमी होती थी और उन्हें जल्दी ही ट्रेन से कूदना होता था| कहा जाता है कि कई बार सी.वी. रमन को कूदने पर चोट भी लगी| इस बीच सी.वी. रमन ने तमाम जर्नल्स में 27 शोध-पत्र प्रकाशित किये| रमन को अपने शोध के लिए कई पुरस्कार भी’ मिले, मगर वह उस समय तक वित्तीय विभाग में ही कार्यरत थे| रमन के कार्यों को देखते हुए महेंद्र लाल सरकार ने इन्डियन असोसिएशन ऑफ़ कल्टीवेशन ऑफ़ साइंस में सी वी. रमन को पालित प्रोफ़ेसर बना दिया था| तब रमन मात्र 29 साल के थे, यह सन 1918  की बात है|

 सन 1921 में जब वह पहली बार इंग्लैड से वापस आ रहे थे तो उन्होंने देखा कि समुद्र का पानी नीला दिखाई दे रहा है| यह आकाश के नीले होने जैसा था जिसकी व्याख्या प्रसिद्ध वैज्ञानिक रेली ने की थी| मगर सी.वी. रमन इससे सहमत महसूस नहीं करते थे कि वैज्ञानिक रेली के सिद्धांत से आकाश की तरह से समुद्र के पानी के नीले होने की बात तर्कसगत ढंग से समझी जा सकती है| इसलिए वह इस विषय को विस्तार से समझने की कोशिश करने लगे| उन्होंने बम्बई पहुँचने के तुरंत बाद विश्व विख्यात जर्नल नेचर के सम्पादक को एक पत्र लिखा जिसे उन्होंने प्रकाशित भी किया| इस पत्र मे उन्होंने समुद्र के नीले दिखने के सम्बन्ध में वैज्ञानिक विश्लेषण किया था| इसके बाद रमन ने तरल पदार्थों से प्रकाश के बिखरने सम्बन्धी कई प्रयोग किये और पाया कि समुद्री जल के विषय में लार्ड रेली के सिद्धांत काफी हद तक सही थे|

रमन ने तरल पदार्थों से प्रकाश के बिखरने का अध्ययन करते हुए कुछ अलग और ख़ास रंगों को देखा| इन रंगों का दिखना पुराने वैज्ञानिक सिद्धांतों के हिसाब से नहीं समझा जा सकता था| इसके विस्तृत अध्ययन के लिए रमन को कुछ बड़े और नए उपकरणों की आवश्यकता थी| रमन को लग रहा था कि वह बहुत ही महत्वपूर्ण वैज्ञानिक खोज के नजदीक हैं| इसलिए उन्होंने कलकत्ता के जाने-माने उद्योगपति घनश्याम दास बिरला को एक पत्र लिखा और उसमे उन्होंने दावा किया कि अगर घनश्याम दास बिरला उन्हें बीस हजार रूपये दें तो वह अगले एक साल में उन्हें नोबेल पुरस्कार लाकर दे सकते हैं| घनश्याम दास बिरला ने सी.वी. रमन का नाम तक नहीं सुना था| बीस हजार रूपये उस समय एक बड़ी रकम होती थी और उसे एक नया 38 साल का युवा प्रोफ़ेसर मांग रहा था, जिसने भारत में ही पढ़ाई की थी और उसके पास एक पीएच डी की डिग्री भी नहीं थी| आश्चर्य जनक बात यह हुई कि बिरला ने सी.वी. रमन को बीस हजार रूपये दे दिए| सी.वी. रमन ने इस पैसों से सन 1927 में आठ इंच अपर्चर वाला नया विदेशी स्पेक्ट्रोमीटर खरीदा| उन्होंने एक टेलेस्कोप भी खरीदा जिससे कि वह सूरज की किरणों को एक स्थान पर फोकस करके एक तीव्र प्रकाशिक स्त्रोत बना सकें| इस प्रकार उन्होंने अपने एक सहकर्मी के.एस. कृष्णन की मदद से “रमन प्रभाव” की खोज की और उन्हें अपने इस सिद्धांत के लिए पूरे विश्व में ख्याति भी मिली| सन 1930 में रमन को नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया| ऐसा कहा जाता है कि रमन खुद को नोबेल पुरस्कार मिलने को लेकर इतने विश्वस्त थे कि उन्होंने नोबेल पुरस्कारों की घोषणा से एक महीने पहले ही स्वीडन की राजधानी स्टोकहोम जाने के लिए पानी के जहाज में अपना और अपनी पत्नी का टिकट लेकर रख लिया था| उन दिनों पानी के जहाज़ से यात्राये करनी पड़ती थी जिससे यूरोप जाने में अधिकतम महीने भर का समय लग जाता था, और टिकट भी काफी पहले से खरीदने पड़ते थे नहीं तो जहाजों में जगह भर जाती थी|   

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