नील्स बोर का वार्नर हाइजेनबर्ग के नाम पत्र

Bohr and Heisenberg, 1934

यह उस पत्र का अपूर्ण प्रारूप है जिसे हाइजेंबर्ग को बोर ने कभी भी नहीं भेजा|

यह पत्र नील्स बोर की धर्मपत्नी मारग्रेट बोर के हाथों की लिखावट में है|

इस पत्र में कोई तारीख नहीं लिखी गई है लेकिन यह बोर के रदरफोर्ड भाषण के बाद ही लिखा गया होगा जिसका प्रकाशित रूप बोर को 15 मार्च 1962 को मिला था।

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प्रिय हाइजेनबर्ग,

मैं यहाँ रदरफोर्ड के एक भाषण का प्रकाशित संस्करण भेज रहा हूँ, जिसमें मैंने परमाणविक नाभिक की खोज से प्रभावित होकर नए उत्थानों से जुड़ी मेरी यादों के बारे में बताने की कोशिश की है। जैसा कि मेरे उस लघु-लेख में जिसे मैंने आपके 60वें जन्मदिन पर लिखा था और मेरे उस भाषण में, जो मैंने सॉल्वे कोंफेरेंस की पचासवीं सालगिरह के उदघाटन अवसर पर दिया था, आपने यह देखा है, मैं इन दिनों भौतिकी के ऐतिहासिक अध्ययन में काफी व्यस्त रहा हूँ, जिसे अब संयोग से वाशिंगटन कमेटी और कारनेगी फ़ाइंडेशन के द्वारा गठित एक अमेरिकी कमेटी ने अपने हाथों में ले लिया है, इसमें इरादा यह है कि आने वाले सालों में कुह्न, जो कि इस प्रोजेक्ट का नेता भी है, कोपेनहेगन में सचिवालय और पुरालेख के लिए एक स्थायी अड्डा बनाएँगे।

खुद को ऐसे मामलों में व्यस्त करते समय, वास्तव में मुझे इस दिशा में हुये विकास कार्यों का सही-सही ब्यौरा देते हुये कई बार परेशानी महसूस होती है, जिनमें कई लोगों की भागेदारी होती है, और यह उसका ब्यौरा देते हुये मुझे बहुत अधिक तीव्रता से महसूस हुआ है जो कि युद्ध के समय में परमाणु ऊर्जा कार्यक्रमों से जुड़ा है| बाद वाले मामले में कई तरफ से तीव्र रुचि थी और कई देशों की सरकारों ने उपलब्ध पुरालेखों को इस्तेमाल करते हुये भी जांच शुरू करा दी थी|

इसी प्रकार से, तमाम देशों में द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान बहस-मुबाहिसों और तैयारियों के बारे में प्रकाश डालने के लिए कमेटियाँ बनाई गईं थीं जो कि परमाणविक भौतिकी के सैन्य उद्देश्यों संबंधी परिणामों के अनुप्रयोगों के पहले बनाईं गईं थीं, और विशेष रूप से आपकी और वीजसेकर की 1941 में हुई कोपेनहेगन यात्रा के प्रबंधों और उद्देश्यों के बारे में कई तरफ से मुझसे पूछा गया था।

मेरे लिए इसका उत्तर देना काफी मुश्किल था क्योंकि जैसा कि आप युद्ध के बाद के हमारी बातचीतों के जरिये जानते हैं, कि उस यात्रा के दौरान जो कुछ भी हुआ उसके बारे में मेरा बहुत अलग नज़रिया है, इसके अलग आपने जो जंक कि किताब में अपने योगदान में प्रस्तुत किया है।

कोपेनहेगन में हमारे लिए, जो खुद को जर्मन अधिग्रहण के दौरान उस मुश्किल और खतरनाक स्थिति में रहे थे, उस यात्रा को हम सब पर एक असाधारण प्रभाव डालने वाली थी, और मैंने इसलिए उस मुलाक़ात में बोले गए हर एक शब्द को नोट/लिख कर रहा था, पूरी यात्रा में हम लगातार डरे हुये थे कि जर्मन पुलिस हम पर निगरानी रखे हुये है, ऐसे में मुझे विशेष रूप से सावधानी की स्थिति में होना था। मैं बहुत ही दृढ़ विश्वास से यह सोचता हूँ कि आप और वीज्शेकर ने जर्मनी की विजय के बारे में अपना विचार जताया था, जो कि हमारी आशाओं से मेल नहीं खाता था, लेकिन जैसे कि युद्ध के बाद, आपका विश्वास पहले से कम मजबूत हुआ होगा और जर्मनी की हार के निश्चित रूप से पूरी तरह से खत्म हो गया होगा।

अतः यह समझ से परे नहीं होना चाहिए कि यदि इस पर नज़र रखना आपके लिए कठिन था कि कैसे बदलती परिस्थितियों की पृष्ठभूमि में जर्मन अधिकारियों के बयान साल दर साल कैसे बदलते रहे। इसके विपिरीत, मुझे यह बहुत साफ तौर पर याद है कि इसने मेरे ऊपर किस तरह का प्रभाव छोड़ा जब वार्तालाप की शुरुआत में ही बिना किसी तैयारी के आपने कहा कि आप इस बारे में अत्यंत निश्चित हैं कि यदि युद्ध लंबा चला तो हार जीत का निर्णय परमानविक हथियारों के जरिये ही होगा| मैंने इसका कोई भी जवाब नहीं दिया था, लेकिन मेरे चुप रहने को आपने शायद संदेह की अभिव्यक्ति ही समझा था, आपने इसका संबंध अपने पूर्ववर्ती वर्षों में विशेष रूप से इसी प्रश्न के उत्तर खोजने में लगा दिया था और आप इस बारे में काफी निश्चित थे कि यह संभव है, लेकिन आपने जर्मन वैज्ञानिकों के पक्ष द्वारा ऐसे किसी प्रकार के विकास को रोकने की दिशा में किए जा रहे प्रयासों के बारे में कोई इशारा नहीं किया|

यह सच है कि सन 1943 में भारी जल का उत्पादन बढ़ाने के प्रयासों में भागी दारी करने के लिए नॉर्वे जाते समय अपनी कोपेनहेगन यात्राओं के दौरान जेन्सन ने इस दिशा में कुछ इशारे किए थे, लेकिन उनके अपने मिशन और जर्मन हथियारों के बारे में लगातार बढ़ रही अफवाहों के कारण, मुझे आवश्यक रूप से अपने और अधिक खतरनाक अस्तित्व में बहुत ही अविश्वासी और अत्यधिक सावधान रहना ज़रूरी था। कुछ महीनों के बाद ही ऐसा हुआ कि तब जर्मन पुलिस द्वारा अकस्मात गिरफ्तारी से बचने के लिए, मैं स्वीडन भाग गया और इंग्लैंड पहुंचा कि मैंने वहाँ और अमेरिका में ज़ोर शोर से चल रही विशाल तैयारियों के बारे में पता चला और यह पता चला कि वह लोग इन तैयारियों में कहाँ तक आ पहुंचे हैं। कि जर्मन इस दिशा में कहाँ तक आ पहुंचे हैं, इस प्रश्न ने न सिर्फ भौतिकविदों बल्कि सरकारों और खुफिया एजेंसियों को भी परेशान कर रखा है, और प्राकृतिक रूप से मुझे बाद के लोगों (सरकारों और खुफिया एजेंसियों) और सरकार के कुछ सदस्यों को अपने कोपेनहेगन संबंधी अनुभवों और विशेष रूप से आपकी और वीजसेकर और जेन्सन की यात्राओं के बारे में बताना पड़ा, जिसकी वजह से निष्कर्षों के बारे में विस्तृत वार्तालापों को उत्पन्न किया, जो कि इन वार्तालापों के दौरान मिली जांकरियों के निकाले जा सकते थे, और इन जानकारियों को खुफिया विभाग के पास उपलब्ध सभी कुछ के साथ तुलना का एक दौर शुरू हुआ। मुद्दा यह था कि जो भी विचार-विमर्श के दौरान सामने रखा गया, और जिसके साथ बाद में की जाने वाली सारी पूछताछों में प्रमुख चिंता का मामला यह था कि वह यात्रा कि व्यवस्था कैसे की गई और इस यात्रा के पीछे का उद्देश्य क्या था, क्योंकि एक व्यक्ति सिर्फ इसलिए विशेष रूप से आश्चर्यचकित था कि कैसे और किसकी अनुज्ञा के साथ, इतना खतरनाक मामला, जिसका कि इतना विशेष राजनैतिक महत्व है, को कैसे किसी अन्य व्यक्ति के साथ एक अधिकृत और शत्रुतापूर्ण देश में वार्तालाप के लिए उठाया गया।

आपका

बोर

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